Sheetala Saptami 2026 हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत-पर्व है, जो शीतला माता को समर्पित होता है। यह पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में शीतला सप्तमी 10 मार्च, मंगलवार को उदयातिथि के अनुसार होगी। इस दिन भक्त शीतला माता की पूजा कर स्वास्थ्य, रोग निवारण, बच्चों की रक्षा और पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यह पर्व विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और हरियाणा में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
Sheetala Saptami 2026: तिथि, शुभ समय और शुभ योग
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व का नाम | शीतला सप्तमी 2026 |
| मास / पक्ष | चैत्र मास, कृष्ण पक्ष |
| सप्तमी तिथि प्रारंभ | 9 मार्च 2026, रात 11:27 बजे |
| सप्तमी तिथि समाप्त | 11 मार्च 2026, सुबह 1:54 बजे |
| शीतला सप्तमी तिथि (उदयातिथि) | 10 मार्च 2026, मंगलवार |
| पूजा का शुभ समय | सुबह 6:24 बजे से शाम 6:26 बजे तक |
| बसौड़ा पर्व | 11 मार्च 2026, बुधवार |
| हर्षण योग | सुबह 8:21 बजे तक |
| रवि योग | पूरे दिन |
| शुभ योगों का फल | रोग निवारण, शुभ कार्यों में सफलता, सिद्धि और उत्तम स्वास्थ्य |
Sheetala Saptami 2026: क्यों मनाई जाती है?
धार्मिक शास्त्रों और लोकमान्यताओं के अनुसार, शीतला माता को चेचक, खसरा, फोड़े-फुंसी, बुखार तथा अन्य संक्रामक रोगों की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। ऐसा विश्वास है कि शीतला माता के प्रकोप से जहां रोग उत्पन्न होते हैं, वहीं उनकी कृपा से वही रोग शांत भी हो जाते हैं। माता का स्वभाव शीतल और करुणामयी माना गया है, जो शरीर और मन दोनों की उष्णता को शांत करता है।
विशेष रूप से बच्चों को शीतला माता की संतान माना जाता है, इसलिए उनकी पूजा से बालकों को बीमारियों, महामारी और अकाल मृत्यु से रक्षा प्राप्त होती है। मान्यता है कि जिस घर में श्रद्धा और विधि-विधान से शीतला माता की उपासना की जाती है, वहां महामारी, रोग और नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं कर पाती, और परिवार का वातावरण शुद्ध, शांत और सुरक्षित बना रहता है। इसी गहन आस्था और अनुभव के कारण शीतला सप्तमी को रोग निवारण और स्वास्थ्य रक्षा का पावन पर्व कहा जाता है।
क्यों कहा जाता है Sheetala Saptami को रोग निवारण और सुख-समृद्धि का दिव्य वरदान?
शीतला सप्तमी के पीछे केवल आस्था ही नहीं, बल्कि जीवन के संतुलन का संदेश भी छिपा है।
🔹 1. शीतलता का सिद्धांत
इस दिन ठंडा (बासी) भोजन ग्रहण किया जाता है। यह शरीर की गर्मी को शांत करता है और संक्रमण से बचाव का संकेत देता है।
🔹 2. स्वास्थ्य संरक्षण की परंपरा
प्राचीन काल में मौसम परिवर्तन के दौरान बीमारियाँ फैलती थीं। शीतला सप्तमी का व्रत संयमित आहार और स्वच्छता सिखाता है।
🔹 3. मातृत्व और बाल सुरक्षा
शीतला माता को बालकों की रक्षक माना गया है। माताएँ विशेष रूप से अपने बच्चों की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह व्रत रखती हैं।
🔹 4. सुख-शांति और समृद्धि
मान्यता है कि शीतला माता की कृपा से
✔ घर में रोग नहीं आते
✔ परिवार में सुख-शांति बनी रहती है
✔ आर्थिक परेशानियाँ दूर होती हैं
इसी कारण यह पर्व सुख-समृद्धि का दिव्य वरदान माना जाता है।
Sheetala Saptami कैसे मनाई जाती है?
Sheetala Saptami की पूजा परंपरागत विधि से अत्यंत श्रद्धा और नियमों के साथ की जाती है। इस पर्व की सबसे विशेष परंपरा यह है कि सप्तमी से एक दिन पहले ही पूरा भोजन बनाकर रख लिया जाता है, ताकि सप्तमी के दिन चूल्हा न जलाया जाए। व्रत के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और शीतला माता की पूजा की जाती है।
माता को विशेष रूप से ठंडा भोजन, शीतल जल, दही और चावल का भोग अर्पित किया जाता है, क्योंकि शीतला माता को शीतल पदार्थ अत्यंत प्रिय माने जाते हैं। भोग में दही-चावल, मालपुआ, दही वड़े, बाजरे की रोटी, पूरी, पराठे, अमचूर की सब्जी तथा राजस्थान में विशेष रूप से बनने वाली पंचकूटा की सब्जी शामिल की जाती है। इसके साथ हल्दी, चावल और फूल अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान शीतला माता की कथा सुनी या पढ़ी जाती है और अंत में विधिपूर्वक आरती कर प्रसाद का वितरण किया जाता है। इस संपूर्ण विधि का पालन करने से माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है और घर में स्वास्थ्य, शांति व सुख-समृद्धि बनी रहती है।
Sheetala Saptami व्रत के नियम
Sheetala Saptami का व्रत अत्यंत संयम और शुद्धता के साथ रखा जाता है। इस दिन व्रती को प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए और पूरे दिन सात्विक आचरण बनाए रखना चाहिए। मान्यता है कि शीतला सप्तमी के दिन क्रोध, कटु वचन, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहना विशेष फलदायी होता है। व्रत के दौरान अत्यधिक मसालेदार और गर्म भोजन का त्याग किया जाता है तथा सादा और शीतल आहार ग्रहण किया जाता है। इस दिन मन, वाणी और कर्म—तीनों की शुद्धता का विशेष महत्व होता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि शीतला माता शुद्ध हृदय से की गई उपासना से शीघ्र प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को स्वास्थ्य, शांति और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।
बसौड़ा / बासी भोजन की परंपरा
Sheetala Saptami की सबसे विशिष्ट और प्राचीन परंपरा बसौड़ा, अर्थात् बासी भोजन का भोग है। इस परंपरा के अनुसार सप्तमी से एक दिन पहले ही समस्त भोजन तैयार कर लिया जाता है और सप्तमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता। अगले दिन वही ठंडा भोजन शीतला माता को अर्पित कर प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है। इस भोग में विशेष रूप से दही-चावल, मालपुआ, दही वड़े, बाजरे की रोटी, पूरी, पराठे, अमचूर की सब्जी तथा राजस्थान में प्रचलित पंचकूटा की सब्जी बनाई जाती है। धार्मिक मान्यता है कि शीतल भोजन माता के स्वभाव का प्रतीक है, जो शरीर की उष्णता को शांत करता है और रोगों से रक्षा करता है। यही कारण है कि बसौड़ा की यह परंपरा स्वास्थ्य संतुलन और रोग निवारण से जुड़ी हुई मानी जाती है।
Sheetala Saptami का धार्मिक और सामाजिक महत्व
Sheetala Saptami का पर्व हमें जीवन का एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है। यह त्योहार सिखाता है कि स्वच्छता, संयम और संतुलित जीवनशैली अपनाकर अनेक रोगों से बचा जा सकता है। शीतला सप्तमी की परंपराएँ हमें प्रकृति के नियमों के अनुरूप जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं, जहाँ आहार, व्यवहार और विचार—तीनों में संतुलन आवश्यक माना गया है। इसी कारण यह पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आरोग्य, अनुशासन और सकारात्मक जीवन दृष्टि को अपनाने का मार्ग भी दिखाता है। वास्तव में, शीतला सप्तमी आस्था, स्वास्थ्य और अनुशासित जीवन का सुंदर संगम है, जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए कल्याणकारी माना गया है।
निष्कर्ष
Sheetala Saptami 2026 केवल एक व्रत नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा और पारिवारिक सुख-समृद्धि का प्रतीक पर्व है। शीतला माता की उपासना से जहां रोगों से मुक्ति मिलती है, वहीं जीवन में शांति, संतुलन और खुशहाली आती है। इसी कारण शीतला सप्तमी को रोग निवारण और सुख-समृद्धि का दिव्य वरदान कहा जाता है। मान्यता है कि शीतला सप्तमी के दिन एक दिन पहले बनाया गया भोजन ग्रहण करने के बावजूद कोई भी बीमार नहीं पड़ता, क्योंकि यह सब शीतला माता के आशीर्वाद से संभव माना जाता है।
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