Dasha Mata Vrat 2026: दशा माता व्रत कब है, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत का महत्व जानिए ।

Dasha Mata Vrat 2026: दशा माता व्रत कब है, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत का महत्व जानिए ।

Dasha Mata Vrat 2026: Jodhpur – साल 2026 में दशामाता का व्रत 13 मार्च को मनाया जाएगा, जो फाल्गुन कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि होती है। इस दिन माता दशा की पूजा विधिपूर्वक की जाती है। व्रत का पालन करने से सुख-समृद्धि आती है और घर में शांति बनी रहती है। दशामाता व्रत में पूजा की सही तिथि, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त का ध्यान रखना बहुत महत्वपूर्ण है।

Dasha Mata Vrat 2026 कब है

फाल्गुन मास की दशमी तिथि: 13 मार्च 2026

नोट: इस दिन घर में मंदिर के नीचे गुलाबी रंग से Dasha Mata बनाई जाती है और उन्हें भोग लगाया जाता है। व्रत को उसी दिन खोला जाता है।

पूजा करते समय पिला धागा बनाया जाता है जिसे भक्तिनें (या महिलाओं द्वारा) अपने गले में पहना जाता है। यह धागा पूरे वर्ष नहीं उतारा जाता और अगले वर्ष व्रत के समय नया धागा पहना जाता है।

Dasha Mata Vrat 2026 पूजा विधि – नयी धरती पंचांग के अनुसार

Dasha Mata व्रत के दिन यदि कोई महिला पहली बार पूजा कर रही है, तो उसे ध्यान रखना चाहिए कि इस व्रत को शुरू करने के बाद इसे छोड़ा नहीं जाता। यह व्रत आजीवन किया जाता है।

पूजा की तैयारी

  1. सुबह जल्दी उठकर घर की अच्छी तरह सफाई करें।
  2. महिलाएँ सज-संवरकर पूजा के लिए तैयार होती हैं – अपने बाल संवारती हैं, नई धोती/कपड़े पहनती हैं और पूरी विधि अनुसार श्रृंगार करती हैं।

पूजा सामग्री

  • रोली, मौली, सुपारी, चावल, दीपक, नैवेद्य, धूप
  • पिला कच्चा धागा (10 गांठ के साथ हल्दी में रंगे हुए)
  • फूल, माला, हल्दी, अक्षत, नारियल, भोग
  • चूड़ी, बिंदी, मेहंदी, सिंदूर और वस्त्र।आदि

पूजा विधि

  1. पिला कच्चा धागा लेकर उसमें 10 गांठ बनाएं और हल्दी में रंग लगाएं। पूजा के बाद इस धागे को गले में पहन लें। इसे पूरे साल गले से नहीं उतारना चाहिए।
  2. पीपल के पेड़ की पूजा:
    • पेड़ के तने को सफेद सूत से 10 बार बांधा जाता है।
    • पेड़ के चारों ओर 10 परिक्रमा लगाई जाती है।
    • इसके बाद, पूरी विधि-विधान से पीपल का पूजन किया जाता है।
  3. Dasha Mata की पूजा पूरे विधि-विधान से करें।
  4. पूजा के अंत में Dasha Mata की 10 कथा सुनना अनिवार्य है।

Dasha Mata Vrat 2026 की कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक राजा की दो रानियां थीं। बड़ी रानी के संतान नहीं थे, जबकि छोटी रानी के पुत्र थे। राजा अपनी छोटी रानी और राजकुमार से बहुत प्यार करता था। बड़ी रानी ने ईर्ष्या में छोटी रानी को सताना शुरू किया और राजकुमार के प्राण हराने की कई योजनाएं बनाईं। एक दिन राजकुमार खेलते-खेलते बड़ी रानी के आंगन में चला गया। बड़ी रानी ने राजकुमार के गले में एक काला सांप डाल दिया। लेकिन छोटी रानी दशामाता का व्रत करती थी और राजकुमार दशामाता का भक्त था। माता दशा की कृपा से सांप से राजकुमार को कोई नुकसान नहीं हुआ। अगले दिन बड़ी रानी ने लड्डू में जहर मिलाकर उसे खिलाने की योजना बनाई। जैसे ही राजकुमार लड्डू खाने लगा, दशामाता ने एक दासी का रूप धारण कर लड्डू उसके हाथ से छीन लिया। बड़ी रानी की यह योजना भी विफल हो गई, जिससे वह बहुत चिंतित हुई।

तीसरे दिन जब राजकुमार फिर आंगन में खेलने गया, तो बड़ी रानी ने उसे गहरे कुएँ में धकेल दिया। कुएँ के कारण किसी को नहीं पता चला कि राजकुमार कहां गया। लेकिन जैसे ही बड़ी रानी ने उसे कुएँ में डाला, दशामाता ने बीच में ही उसे रोक लिया। दोपहर होते-होते राजकुमार घर नहीं लौटा, जिससे राजा और छोटी रानी दोनों चिंतित हो गए। तब दशामाता ने भिखारी का रूप धारण किया और राजकुमार को अपने गले में लेकर राज द्वार पर आ गईं। उन्होंने राजकुमार को एक वस्त्र में छिपाया और भिक्षा मांगने लगीं। सिपाहियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन माता ने अपनी शक्ति से राजकुमार को सुरक्षित रखा और आगे बढ़ने दिया। फिर माता ने राजकुमार को चौक में छोड़ दिया और वापस चली गईं। बड़ी रानी ने दशामाता रूपी भिखारिन को देखा और पूछा, “तुम कौन हो और तीन दिन मेरे बेटे को छुपा कर रखा?” दशामाता ने उत्तर दिया कि वह कोई साधारण भिखारिन नहीं हैं, बल्कि उनकी आराध्य देवी हैं, जो छोटे राजकुमार की रक्षा के लिए आई हैं। उन्होंने यह भी बताया कि बड़ी रानी ने कई बार राजकुमार को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की थी, जिसे उन्होंने विफल किया।

छोटी रानी ने माता दशा के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और विनम्र भाव से कहा कि वह हमेशा उनकी सेवा करेगी। माता दशा ने उत्तर दिया कि वह किसी के घर स्थायी रूप से नहीं रहतीं, बल्कि जो भक्त उनका ध्यान श्रद्धा और भक्ति से करता है, उसके हृदय में निवास करती हैं। उन्होंने आदेश दिया कि सुहागिनों को बुलाकर उन्हें आदर सत्कार और भोजन कराया जाए और नगर में ढिंढोरा पिटवाया जाए कि सभी लोग दशा माता का डोरा लें और व्रत करें। इतना कहकर दशामाता अंतर्ध्यान हो गईं। रानी ने अपने राज्य की सौभाग्यवती स्त्रियों को आमंत्रित कर उनकी सेवा और भोजन कराया। दक्षिणा में गहने देकर विदा किया और अपने राज्य में यह नियम स्थापित किया कि अब से सभी लोग Dasha Mata का डोरा लें और व्रत करें।

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