जहरीली कफ सिरप का कहर : 24 मासूमों की मौत

जहरीली कफ सिरप से मासूमों की मौत का तांडव – 24 बच्चों ने तोड़ा दम, दवा कंपनियों पर उठे सवाल – भारत में हाल ही में ऐसी ही एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जिसमें कफ सिरप में जहरीले घटक पाए जाने की वजह से 24 बच्चों की जानें चली गई।दवा सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल।यह न केवल एक स्वास्थ्य आपदा है, बल्कि कई सवाल खड़े करती है — दवा निर्माण एवं निगरानी तंत्र की विश्वसनीयता, जिम्मेदार निहित पक्षों की जवाबदेही, और भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के उपाय।

जहरीली कफ सिरप का कहर : 24 मासूमों की मौत

घटना का सिलसिला

  • शुरुआती रिपोर्टों में बताया गया कि मध्य भारत (कई जिलों में) छोटे बच्चों को कफ सिरप (खांसी की दवा) दी गई और कुछ दिनों बाद वे अचानक गुर्दे (किडनी) विफलता की स्थिति में पहुँच गए।
  • अस्पतालों में शिशुओं और बच्चों में पेशाब कम होना, उल्टी, निर्जलीकरण, बढ़ती थकावट और अंततः मृत्यु की स्थिति सामने आई।
  • प्रारंभिक मीडिया रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 20–22 बताई गई, लेकिन बाद में स्वास्थ्य विभागों और जांच समितियों की पुष्टि के बाद यह संख्या 24 तक पहुँच गई
  • राज्य सरकारों ने तुरंत संबंधित सिरप को बैन कर दिया और दवा निर्माता कंपनी तथा संबंधित अधिकारियों पर अपराध दर्ज करने का निर्देश दिया।
  • जांच में पता चला कि यह सिरप “COLD–? (Coldrif)” नामक ब्रांड से संबंधित था और इसे दक्षिण भारत की एक दवा कंपनी द्वारा निर्मित किया गया था।

मिलावट (फार्मूला / जहरीली सामग्री) — कैसे हुआ ज़हर?

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है — कैसे एक सामान्य कफ सिरप जहरीला बन गया। जांचों में निम्नलिखित तथ्य सामने आए हैं:

  1. डायएथीलिन ग्लाइकोल (Diethylene Glycol, DEG)
    – सिरप से लिए गए नमूनों में यह जहरीला रसायन पाया गया।
    – DEG एक औद्योगिक विलायक (solvent) है, और सामान्यतः नमी न रुकने वाली, ऑटोमोटिव या अन्य रासायनिक अनुप्रयोगों में उपयोग किया जाता है।
    – मेडिकल/फार्मास्युटिकल उपयोग के लिए यह बिल्कुल नहीं होना चाहिए।
    – रिपोर्टों के अनुसार, DEG की मात्रा सिरप में अनुमत स्तर से कहीं अधिक पाई गई — रिपोर्टों में यह कहा गया कि यह लगभग 500 गुना अधिक हो सकती है। Reuters+2Reuters+2
  2. अनियमित कच्चे माल का उपयोग
    – दवा कंपनी ने संभवतः फार्मास्युटिकल ग्रेड विलायक की बजाय औद्योगिक ग्रेड गुनगुनी गुणवत्ता वाले (contaminated) विलायक का उपयोग किया।
    – विशेष रूप से ग्लिसरिन या अन्य सॉल्वेंट्स में मिलावट की आशंका मानी गई है।
  3. गुणवत्ता नियंत्रण की कमी
    – निर्माताओं और दवा नियंत्रण संस्थाओं द्वारा प्रत्येक बैच का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया गया।
    – नियंत्रण प्रयोगशालाओं तथा नियामक संस्थाओं (FDA, CDSCO आदि) के जांच तंत्र में गड़बड़ी या चूक हो सकती है।
    – विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस घटना को एक नियामकीय अंतराल (regulatory gap) का उदाहरण बताया। Reuters
  4. इतिहास में DEG विषाक्तता के उदाहरण
    – चिकित्सा इतिहास में कई उदाहरण मिलते हैं जहाँ DEG मिलावट ने मौतें कीं — जैसे 1937 में अमेरिका में Elixir Sulfanilamide त्रासदी। U.S. Food and Drug Administration
    – अन्य देशों में भी, जैसे गाम्बिया, यूज्बेकिस्तान आदि, भारतीय निर्मित सिरपों में DEG मिलावट पाई गई। Vision IAS+3Wikipedia+3Wikipedia+3
  5. विषाक्त प्रभाव
    – DEG का सेवन शरीर में पहुँचने के बाद गुर्दों (kidneys) पर तीव्र दबाव डालता है, जिससे गुर्दे विफल हो सकते हैं
    – इसके अलावा यकृत (लिवर), पैनक्रियास, तंत्रिका तंत्र (न्यूरोलॉजिक प्रभाव) और अन्य अंगों पर भी व्यापक असर हो सकता है।
    – शुरुआती लक्षणों में पानी कम आना (oliguria), पेशाब बंद होना (anuria), उल्टी, तेज़ निर्जलीकरण, सुस्ती और सांस लेने में कठिनाई हो सकती है।

नई और अहम जानकारी

जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जिस फार्मूले से यह जहरीली कफ सिरप तैयार की गई थी, उस पर डीजीसीआई ने 18 दिसंबर 2023 को ही रोक लगा दी थी। आदेश के बावजूद यह दवा न केवल उत्पादन में बनी रही, बल्कि कई राज्यों में खुलेआम बिकती रही।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रशासनिक और नियामकीय लापरवाही का गंभीर उदाहरण है।
सवाल यह उठता है कि जब फॉर्मूला पहले ही प्रतिबंधित (Banned) था, तो उसकी निर्माण और बिक्री की अनुमति किसने दी? इस पूरे मामले में राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर जवाबदेही तय की जानी चाहिए।”

  1. डीजीसीआई (Drugs Controller General of India) ने 18 दिसंबर 2023 को ही इस कफ सिरप के फार्मूले पर रोक लगा दी थी।
    ➤ यानी दो साल पहले ही यह फॉर्मूला बैन किया जा चुका था, क्योंकि इसमें पाए जाने वाले तत्व बच्चों के लिए हानिकारक माने गए थे।
  2. फिर भी यह जहरीली दवा बाज़ार में बिकती रही — यह सवाल खड़ा करता है कि नियामक संस्थाओं की निगरानी प्रणाली (Regulatory oversight) में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई।
  3. 1,470 फार्मा कंपनियों के पास मानक परीक्षण रिपोर्ट नहीं थी, जिन पर सरकार ने पहले ही निगरानी के आदेश दिए थे।
  4. आदेशकी अवहेलना:
    ➤ आदेश के अनुसार, दवा निर्माण से पहले सभी कंपनियों को अपने कच्चे माल की जांच रिपोर्ट देना अनिवार्य था।
    ➤ मगर कई कंपनियों ने न तो यह परीक्षण कराया और न ही रिपोर्टें जमा कीं।
  5. तमिलनाडु सरकार ने कार्रवाई करते हुए संदिग्ध कफ सिरप बनाने वाली कंपनी की फैक्ट्री को सील कर दिया है।
    ➤ केंद्रीय टीम ने मौके पर जाकर सैंपल लिए हैं और अन्य राज्यों को भी अलर्ट किया गया है।
  6. जांच में पाया गया:
    ➤ यह वही फार्मूला था, जिसे दिसंबर 2023 में डीजीसीआई ने प्रतिबंधित किया था।
    ➤ इसके बावजूद दवा कंपनियों ने इसका उत्पादन जारी रखा और राज्य स्तरीय औषधि नियंत्रण विभागों ने इसकी बिक्री पर रोक नहीं लगाई।
  7. बड़ा सवाल:
    ➤ अगर फार्मूला दो साल पहले बैन हुआ था, तो यह दवा फिर भी बाजार में कैसे पहुंची?
    ➤ जिम्मेदारी केवल निर्माता की है या निगरानी एजेंसियों की भी?

राज्य तथा केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया

जहरीली कफ सिरप का कहर : 24 मासूमों की मौत, डीजीसीआई की रोक के बाद भी जारी रही बिक्री — दवा सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल, राज्य और केंद्र सरकार हरकत में; जानिए क्या है उनकी प्रतिक्रिया
  1. तत्काल कार्रवाई और रिकॉल (Recall)
     - संबंधित कफ सिरप की बिक्री पर तत्काल रोक लगाई गई।
     - बाजार, अस्पतालों और दवा विक्रेताओं से जद дох सिरप के रिकॉल आदेश दिए गए।
     - संबंधित दवा कंपनी की लाइसेंसें निलंबित या रद्द करने की प्रक्रिया शुरू हुई। Reuters+4Reuters+4The Times of India+4
  2. जांच समिति और कानूनी कार्रवाई
     - विशेष जांच टीम (SIT) गठित की गई, जो निर्माता, वितरक और नियामक अधिकारियों को जवाबदेह ठहराएगी।
     - कंपनी मालिकों और संबंधित अधिकारियों को हत्या, औषधि मिलावट, अपराध दायित्व आदि धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया। Reuters+2The Times of India+2
  3. सामान्य चेतावनी और निवेदन
     - स्वास्थ्य मंत्रालय ने जनता को चेतावनी जारी की कि किसी भी कफ सिरप का उपयोग डॉक्टर की सलाह के बिना न करें।
     - विशेष रूप से बच्चों के लिए कफ और Cold medicines (खांसी और जुखाम की दवाओं) से सावधानी बरतने का निर्देश जारी किया गया। The Times of India+3The Economic Times+3The Economic Times+3
  4. नियामकीय सुधार और निरीक्षण बढ़ाना
     - दवा नियंत्रण एजेंसियों (FDA, CDSCO आदि) को सख्त निर्देश दिए गए कि वे तरल और सस्पेंशन दवाओं पर विशेष नजर रखें। The Times of India+2The Times of India+2
     - प्रत्येक दवा निर्माता को सभी कच्चे माल और अंतिम उत्पादों की लैब परीक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
     - आयात और वितरण चैनलों की ऑडिटिंग की जाएगी।
     - राज्यों में दवा निरीक्षण तंत्र को सुदृढ़ करने की पहल की जाएगी।

क्या इस त्रासदी से पूर्व इतिहास था?

भारत में जहरीली कफ सिरप का कहर : 24 मासूमों की मौत, और हाँ — ऐसी दर्दनाक घटनाएँ पहले भी सामने आ चुकी हैं, जिनसे पूरी व्यवस्था पर सवाल उठे हैं।
  • 2022 में गाम्बिया में भारत-निर्मित चार कफ सिरप में DEG मिलावट पाए जाने के बाद करीब 70 बच्चों की मौत हुई थी। Wikipedia+2Wikipedia+2
  • यूज़्बेकिस्तान में “Dok-1 Max” नामक सिरप में DEG/EG मिलावट की वजह से 20 बच्चों की मौत हुई थी। Wikipedia
  • 1937 में अमेरिका में Sulfanilamide एलिक्सीर (Liquid) में DEG मिलावट से कई लोगों की मृत्यु हो गई — इस घटना ने दवा सुरक्षा कानूनों की नींव को बदल दिया था। U.S. Food and Drug Administration

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि DEG विषाक्तता एक पुरानी समस्या है, जिसे नियंत्रित करने में विफलता गंभीर परिणाम दे सकती है।

आगे की चुनौतियाँ और संभावित समाधान

  1. विश्वसनीय दवा निरीक्षण एवं परीक्षण तंत्र
     - राज्य और केंद्र स्तर पर स्वतंत्र, विश्वसनीय और स्वीकृत प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ानी होगी।
     - हर बैच दवा की रासायनिक एवं विषैली परीक्षण अनिवार्य होना चाहिए।
     - विशेष रूप से DEG और EG (Ethylene Glycol) जैसे संभावित विषाक्त घटकों की जाँच होना ज़रूरी है।
  2. कच्चे माल की पहचान और स्रोत आकलन
     - दवा निर्माता केवल फार्मास्युटिकल ग्रेड कच्चे माल (ग्लिसरिन, सॉल्वेंट्स आदि) उपयोग करें।
     - आपूर्तिकर्ताओं की सत्यता, उनकी प्रमाणपत्र (Certificate of Analysis) और परीक्षण रिपोर्ट मंगवानी चाहिए।
     - ग्लिसरिन/सॉल्वेंट्स की टेस्टिंग सुनिश्चित कराना चाहिए कि वे DEG मुक्त हों।
  3. कानूनी और दंडात्मक व्यवस्था की मजबूती
     - दोषी दवा निर्माताओं, सरकारी अधिकारियों और दोषी चिकित्सकों को कड़ी दंडात्मक कार्रवाई हो।
     - बेहतर न्यायिक प्रक्रिया और पारदर्शी जांच हो।
     - पीड़ित परिवारों को मुआवजा मिलना चाहिए।
  4. जन जागरूकता और सावधानी
     - माता–पिता और डॉक्टरों को बताना चाहिए कि बच्चों को सिरप देने से पहले सही ब्रांड, बॅच नंबर, एक्सपायरी डेट इत्यादि जांच लें।
     - बच्चों में खांसी या जुखाम होने पर, अनचाहे सिरप न लें — डॉक्टर से सलाह लें।
     - सरकार, स्वास्थ्य विभाग और मीडिया को मिलकर सार्वजनिक चेतावनी अभियान चलाना चाहिए।
  5. नियमों में सुधार और निगरानी तंत्र सशक्त करना
     - दवाओं की लाइसेंसिंग और निरीक्षण प्रक्रिया में सुधार करना होगा।
     - ऑडिट और अप्रत्याशित निरीक्षण (surprise inspections) बढ़ाने होंगे।
     - सूचना पारदर्शिता हो – जनता को जानकारी मिले कि कौन सी दवाएं जांच में फेल हुईं।
     - अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप दवा सुरक्षा प्रणाली स्थापित हो।

निष्कर्ष

यह भयावह घटना — जहरीली कफ सिरप का कहर : 24 मासूमों की मौत— हमें यह याद दिलाती है कि दवा सुरक्षा और गुणवत्ता नियंत्रण कितने महत्वपूर्ण हैं। एक छोटी सी चूक — जैसे कच्चे माल में मिलावट या परीक्षण तंत्र की गिरावट — मासूम बच्चों की ज़िंदगियों को खतरे में डाल सकती है।

इस त्रासदी का असर सिर्फ मृतक परिवारों का शोक नहीं है — यह एक चेतावनी है कि दवा निर्माताओं, नियामक संस्थाओं और सरकार को कड़ी और सार्थक कार्रवाई करनी होगी। केवल प्रतिक्रियात्मक कदम नहीं, बल्कि पूर्वनियंत्रण, सतर्कता और जवाबदेही की एक प्रणाली बनानी होगी ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियाँ न हों।